जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं।
वह हृदय नहीं, वह पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।
भूमिका-स्वतंत्रता सभी को प्रिय है। इसीलिए तुलसीदास ने कहा है- ‘पराधीन सपनेहुँ सुख नाही।’ जब कोई राष्ट्र पराधीन हो जाता है तो उसके निर्वासियों का जीवन भी अभिशाप बन जाता है। भारत जैसा महान् राष्ट्र भी सैकड़ों वर्षों तक अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरों में जकड़ा रहा तथा आपसी फूट एवं वैमनस्य के कारण पराधीनता के अभिशाप को सहता रहा।

स्वाधीनता का उदय-सन् 1857 में सबसे पहले आजादी की पहली लड़ाई लड़ी गई परन्तु अंग्रेजों की शक्ति तथा क्रान्तिकारियों के साधनों की कमी के कारण यह सफल न हो पाया। हाँ, लक्ष्मीबाई, तात्याँ टोपे तथा नाना साहब के बलिदान से जनता में जागृति अवश्य उत्पन्न हुई। तभी से देश भर में स्वतंत्रता के लिए प्रयास होते रहे। तिलक, गोखले, गाँधी, नेहरू, भगतसिंह, आजाद, सुभाषचन्द्र बोस सरीखे अनेक राष्ट्र-भक्तों के नेतृत्व में भारतीय जनता ने संघर्ष किया। अनेक युवकों ने हँसते-हँसते फाँसी के फन्दों को चूमा, जेलों में घोर यातनाएँ सहीं तथा अपने प्राणों का बलिदान दिया। ब्रिटिश सरकार ने भी अपना दमन चक्र तेज कर दिया एवं स्वाधीनता के आन्दोलन को कुचलने का पूरा प्रयास किया, परन्तु गाँधी जी के नेतृत्व में अन्ततः 15 अगस्त, 1947 को उन्हें देश छोड़कर जाना पड़ा।
पराधीनता की काल-रात्रि समाप्त हो गई और भारत में सैंकड़ों वर्षों के बाद स्वाधीनता का सूर्य उदय हुआ। भारत की स्वतंत्रता का संग्राम विश्व में अनूठा था। सत्य एवं अहिंसा द्वारा स्वतंत्रता प्राप्त करने का यह पहला उदाहरण था। अंग्रेजों ने जाते-जाते इस पावन धरा को दो भागों में विभक्त कर दिया। जिसके कारण भीषण रक्तपात हुआ।
पर्व का आयोजन-जवाहर लाल नेहरू को स्वाधीन भारत का प्रथम प्रधानमंत्री बनाया गया। तभी से आज तक 15 अगस्त का दिन स्वतंत्रता दिवस के रूप में प्रतिवर्ष मनाया जाता है। इस दिन सभी कार्यालयों, स्कूल-कॉलेजों आदि में अवकाश रहता है। देश के विभिन्न भागों में राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है तथा सरकारी भवनों पर रोशनी भी की जाती है। मुख्य कार्यक्रम देश की राजधानी दिल्ली में आयोजित होता है। दिल्ली के ऐतिहासिक लालकिले पर प्रधानमंत्री जी राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं तथा राष्ट्र को सम्बोधित करते हैं। इस उत्सव को देखने अपार जन-समूह उमड़ पड़ता है।
इस दिन अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाता है। इन कार्यक्रमों द्वारा स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धा सुमन अर्पित किए जाते हैं तथा उनके त्याग एवं बलिदान का स्मरण किया जाता है।
उपसंहार-यह दिन हमें प्रेरणा देता है कि हमें राष्ट्रीय एकता को बनाए रखना चाहिए तथा देश की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कृत संकल्प रहना चाहिए। हमें आपसी फूट, वैर तथा वैमनस्य से दूर रहना चाहिए जिसके कारण हम पराधीन हुए थे। इस दिन हमें यह प्रण करना चाहिए कि जिन शहीदों ने अपना बलिदान देकर हमें आजादी का उपहार दिया, हम उन्हें कभी नहीं भूलेंगे तथा कोई भी ऐसा काम नहीं करेंगे जिससे फिर कभी हमें पराधीनता का मुँह देखना पड़े। हमें बापू के रामराज के सपनों को पूरा करने का भी संकल्प करना चाहिए।
